“संचार साथी ऐप से सरकार हमारे फोन झाँक रही?” विपक्ष की तीखी चिटकार!

गौरव त्रिपाठी
गौरव त्रिपाठी

केंद्र सरकार ने हाल ही में मोबाइल हैंडसेट कंपनियों को आदेश दिया है कि नए स्मार्टफोन्स में संचार साथी (Sanchar Saathi) ऐप को प्री-इंस्टॉल करना अनिवार्य होगा। इसी आदेश के बाद देश की राजनीति में तगड़ा घमासान शुरू हो गया है।

विपक्ष का आरोप है कि यह ऐप साइबर सुरक्षा के नाम पर सरकारी निगरानी का एक नया रास्ता खोल सकता है।

प्रियंका गांधी वाड्रा का हमला: “यह एक जासूसी ऐप है”

कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने सबसे तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा— लोगों को निजता का अधिकार है। सरकार तानाशाही पर उतर आई है। संचार साथी एक जासूसी ऐप बन सकता है। सरकार नागरिकों के निजी मैसेज पर नजर रखना चाहती है।

प्रियंका गांधी का कहना है कि अगर सरकार को साइबर सुरक्षा मजबूत करनी है, तो इसके लिए अलग और सुरक्षित विकल्प मौजूद हैं—
पर लोगों के फोन में झाँकने का अधिकार सरकार को नहीं मिल सकता।

रेणुका चौधरी की कड़ी प्रतिक्रिया

कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी ने इसे नागरिकों के मौलिक अधिकारों का अपमान बताया।
उनका कहना है कि ऐप की प्री-इंस्टॉलेशन से लोगों के पर्सनल डेटा पर जोखिम बढ़ेगा। सरकार की निगरानी की क्षमता बढ़ जाएगी। यह भारत में डिजिटल प्राइवेसी को खत्म कर सकता है।

इमरान मसूद: “सरकार देश को नॉर्थ कोरिया बना रही है”

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद ने बेहद कड़े शब्दों में विरोध जताया।

उनका बयान— “सरकार देश को नॉर्थ कोरिया बनाने पर तुली है। लोगों के बेडरूम तक में झाँकना चाहती है। जरूरत पड़ी तो नेशनल लेवल पर आंदोलन करेंगे।”

क्या है सरकार का पक्ष?

सरकार का दावा है कि संचार साथी ऐप— सिम धोखाधड़ी, फर्जी आईडी, चोरी हुए मोबाइल की शिकायत दर्ज करने और उन्हें ट्रैक करने में मदद करता है।
लेकिन विपक्ष का मानना है कि यह ऐप Transparency की कमी और Privacy Concerns के चलते विवादों में है।

लोकतंत्र में सवाल उठाना जरूरी: प्रियंका गांधी

प्रियंका गांधी ने आगे कहा— “लोकतंत्र जनता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की मांग करता है। लेकिन सरकार किसी भी मुद्दे पर चर्चा नहीं होने दे रही है।”

उन्होंने कहा कि साइबर सुरक्षा ज़रूरी है, लेकिन यह जनता के निजी स्पेस में दखल का बहाना नहीं बननी चाहिए।

संचार साथी ऐप पर जारी विवाद आने वाले दिनों में और गर्मा सकता है। जहाँ सरकार इसे सुरक्षा उपाय बताती है, वहीं विपक्ष इसे डिजिटल जासूसी और निजता के अधिकार का हनन मान रहा है।

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